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ततः संचिन्तयन् कुर्याद् अक्षरपुरुषोत्तमम्।
व्यापकं सर्वकेन्द्रं च प्रतिमानां प्रदक्षिणाः॥ ६८॥
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दिव्यभावेन भक्त्या च तदनु प्रार्थयेज्जपन्।
स्वामिनारायणं मन्त्रं शुभसङ्कल्पपूर्तये॥ ७१॥
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ब्रह्माऽक्षरगुरुद्वारा भगवान् प्रकटः सदा।
सहितः सकलैश्वर्यैः परमाऽऽनन्दमर्पयन्॥ १०७॥
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सिद्धान्तं परमं दिव्यम् एतादृशं विचिन्तयन्।
सत्सङ्गं निष्ठया कुर्याद् आनन्दोत्साहपूर्वकम्॥ ११५॥
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कुर्याद्धि भजनं कुर्वन् क्रिया आज्ञाऽनुसारतः।
क्रियाबन्धः क्रियाभारः क्रियामानस्ततो नहि॥ १२४॥
3. द्वि वचन
उरसि हस्तयोश्चन्द्रं तिलकं चन्दनेन च।
स्वामिनारायणं मन्त्रं जपन् कुर्याद् गुरुं स्मरन्॥ ५४॥
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हरिर्ब्रह्मगुरुश्चैव भवतो मोक्षदायकौ।
तयोरेव हि कर्तव्यं ध्यानं मानसपूजनम्॥ ५९॥
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मध्ये तु स्थापयेत्तत्र ह्यक्षरपुरुषोत्तमौ।
स्वामिनं हि गुणातीतं महाराजं च तत्परम्॥ ६१॥
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आह्वानश्लोकमुच्चार्य हरिं च गुरुमाह्वयेत्।
हस्तौ बद्ध्वा नमस्कारं कुर्याद्धि दासभावतः॥ ६३॥
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प्रस्थाप्यौ विधिवत् तस्मिन्नक्षरपुरुषोत्तमौ।
गुरवश्च गुणातीता भक्त्या परम्परागताः॥ ८०॥
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तेषु मायापरौ नित्यम् अक्षरपुरुषोत्तमौ।
जीवानामीश्वराणां च मुक्तिस्तद्योगतो भवेत्॥ १०४॥
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अहो इहैव नः प्राप्तावक्षरपुरुषोत्तमौ।
तत्प्राप्तिगौरवान्नित्यं सत्सङ्गानन्दमाप्नुयात्॥ १२८॥
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दृश्यो न मानुषो भावो भगवति तथा गुरौ।
मायापरौ यतो दिव्यावक्षरपुरुषोत्तमौ॥ १३१॥
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वार्ता कार्या महिम्नो हि ब्रह्मपरमब्रह्मणोः।
तत्सम्बन्धवतां चाऽपि सस्नेहमादरात् सदा॥ १३९॥
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स्वधर्मं पालयेन्नित्यं परधर्मं परित्यजेत्।
स्वधर्मो भगवद्गुर्वोराज्ञायाः परिपालनम्॥ १५६॥
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धनद्रव्यधरादीनां सदाऽऽदानप्रदानयोः।
नियमा लेखसाक्ष्यादेः पालनीया अवश्यतः॥ १८९॥
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धनद्रव्यधरादीनां प्रदानाऽऽदानयोः पुनः।
विश्वासहननं नैव कार्यं न कपटं तथा॥ १९८॥
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बाल्यादेव हि सत्सङ्गं कुर्याद् भक्तिं च प्रार्थनाम्।
कार्या प्रतिदि नं पूजा पित्रोः पञ्चाङ्गवन्द ना॥ २१२॥
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स्वसंप्रदायग्रन्थानां यथाशक्ति यथारुचि।
संस्कृते प्राकृते वाऽपि कुर्यात् पठनपाठने॥ २३५॥
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आदित्यचन्द्रयोर्ग्राह-काले सत्सङ्गिभिः समैः।
परित्यज्य क्रियाः सर्वाः कर्तव्यं भजनं हरेः॥ २६४॥
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एतच्छास्त्रानुसारेण यः प्रीत्या श्रद्धया जनः।
आज्ञोपासनयोर्दार्ढ्यं प्रकुर्यात् स्वस्य जीवने॥ २८८॥
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सत्सङ्गे दिव्यसम्बन्धाद् ब्रह्मणः परब्रह्मणः।
सर्वेषां जायतां दार्ढ्यं निर्दोषदिव्यभावयोः॥ ३०७॥
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4. णिच प्रत्यय
अतः समाश्रयेन्नित्यं प्रत्यक्षमक्षरं गुरुम्।
सर्वसिद्धिकरं दिव्यं परमात्माऽनुभावकम्॥ २५॥
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वार्धक्येन च रोगाद्यैरन्याऽऽपद्धेतुना तथा।
पूजार्थम् असमर्थश्चेत् तदाऽन्यैः कारयेत् स ताम्॥ ७७॥
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यज्ञपुरुषदासेन स्थापितो मूर्तिम त्तया।
गुरुचरित्रग्रन्थेषु पुनरयं दृढायितः॥ ११२॥
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स्वसंप्रदायग्रन्थानां यथाशक्ति यथारुचि।
संस्कृते प्राकृते वाऽपि कुर्यात् पठनपाठने॥ २३५॥
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सम्प्रदायस्य शास्त्राणां पठनं पाठनं तदा।
यथारुचि यथाशक्ति कुर्याद् नियमपूर्वकम्॥ २४३॥
5. क्त्वा प्रत्यय
स्वामिनारायणेऽनन्य-दृढपरमभक्तये।
गृहीत्वाऽऽश्रयदीक्षाया मन्त्रं सत्सङ्गमाप्नुयात्॥ १८॥
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मत्वाऽपि यज्ञशेषं च वाऽपि देवनिवेदितम्।
मांसं कदापि भक्ष्यं न सत्सङ्गमाश्रितैर्जनैः॥ ३७॥
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सत्सङ्गिभिः प्रबोद्धव्यं पूर्वं सूर्योदयात् सदा।
ततः स्नानादिकं कृत्वा धर्तव्यं शुद्धवस्त्रकम्॥ ५१॥
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पूर्वस्यामुत्तरस्यां वा दिशि कृत्वा मुखं ततः।
शुद्धाऽऽसनोपविष्टः सन् नित्यपूजां समाचरेत्॥ ५२॥
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आह्वानश्लोकमुच्चार्य हरिं च गुरुमाह्वयेत्।
हस्तौ बद्ध्वा नमस्कारं कुर्याद्धि दासभावतः॥ ६३॥
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एकपादोत्थितो भूत्वा मालाम् आवर्तयेत् ततः।
तपस ऊर्ध्वहस्तः सन् कुर्वाणो मूर्तिदर्शनम्॥ ६७॥
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भक्तितः पूजयित्वैवम् अक्षरपुरुषोत्तमम्।
पुनरागममन्त्रेण प्रस्थापयेन्निजात्मनि॥ ७२॥
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सेवा हरेश्च भक्तानां कर्तव्या शुद्धभावतः।
महद्भाग्यं ममास्तीति मत्वा स्वमोक्षहेतुना॥ १२२॥
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आज्ञां भगवतो नित्यं ब्रह्मगुरोश्च पालयेत्।
ज्ञात्वा तदनुवृत्तिं च तामेवाऽनुसरेद् दृढम्॥ १४३॥
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देहत्रय- यवस्थातो ज्ञात्वा भेदं गुणत्रयात्।
स्वात्मनो ब्रह्मणैकत्वं प्रतिदिनं विभावयेत्॥ १५०॥
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मिलित्वा भोजनं कार्यं गृहस्थैः स्वगृहे मुदा।
अतिथिर्हि यथाशक्ति संभाव्य आगतो गृहम्॥ १७६॥
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गुणसामर्थ्यरुच्यादि विदित्वैव जनस्य तु।
तदुचितेषु कार्येषु योजनीयो विचार्य सः॥ २०३॥
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निद्रां च भोजनं त्यक्त्वा तदैकत्रोपविश्य च।
कर्तव्यं ग्राहमुक्त्यन्तं भगवत्कीर्तनादिकम्॥ २६५॥
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आपत्काले तु सत्येव ह्यापदो धर्ममाचरेत्।
अल्पापत्तिं महापत्तिं मत्वा धर्मं न संत्यजेत्॥ २६९॥
6. ल्यप प्रत्यय
यागादिके च कर्तव्ये सिद्धान्तं सांप्रदायिकम्।
अनुसृत्य हि कर्तव्यं हिंसारहितमेव तत्॥ ३६॥
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विचार्यैवं बलं रक्षेद् नाऽऽश्रितो निर्बलो भवेत्।
आनन्दितो भवेन्नित्यं भगवद्बलवैभवात्॥ ४८॥
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आह्वानश्लोकमुच्चार्य हरिं च गुरुमाह्वयेत्।
हस्तौ बद्ध्वा नमस्कारं कुर्याद्धि दासभावतः॥ ६३॥
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साष्टाङ्गा दण्डवत् कार्याः प्रणामाः पुरुषैस्ततः।
नारीभिस्तूपविश्यैव पञ्चाङ्गा दासभावतः॥ ६९॥
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तदनु प्रणमेद् भक्तान् आदरान्न म्रभाव तः।
एवं पूजां समाप्यैव कुर्यात् स्वव्यावहारिकम्॥ ७५॥
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यैव रसवती पक्वा मन्दिरे तां निवेदयेत्।
उच्चार्य प्रार्थनं भक्त्या ततः प्रसादितं जमेत्॥ ८३॥
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संभूय प्रत्यहं कार्या गृहसभा गृहस्थितैः।
कर्तव्यं भजनं गोष्ठिः शास्त्रपाठादि तत्र च॥ ८६॥
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मन्दिराणां हि निर्माणं तदाज्ञामनुसृत्य च।
दिव्यानां क्रियते भक्त्या सर्वकल्याणहेतुना॥ ९०॥
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निजाऽऽत्मानं ब्रह्मरूपं देहत्रयविलक्षणम्।
विभाव्योपासनं कार्यं सदैव परब्रह्मणः॥ ११६॥
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भक्तिं वा ज्ञानमालम्ब्य नैवाऽधर्मं चरेज्जनः।
अपि पर्वविशेषं वाऽऽलम्ब्य नाऽधर्ममाचरेत्॥ ११८॥
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तदाज्ञां पालयेत् सद्य आलस्यादि विहाय च।
सानन्दोत्साहमाहात्म्यं तत्प्रसादधिया सदा॥ १४४॥
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तदाज्ञां यत् परित्यज्य क्रियते स्वमनोधृतम्।
परधर्मः स विज्ञेयो विवेकिभिर्मुम ुक्षुभिः॥ १५७॥
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मिलित्वा भोजनं कार्यं गृहस्थैः स्वगृहे मुदा।
अतिथिर्हि यथाशक्ति संभाव्य आगतो गृहम्॥ १७६॥
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लौकिकं त्वविचार्यैव सहसा कर्म नाऽऽचरेत्।
फलादिकं विचार्यैव विवेकेन तद् आचरेत्॥ १९२॥
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कर्तव्यं लेखनं सम्यक् स्वस्याऽऽयस्य व्ययस्य च।
नियमाननुसृत्यैव प्रशासनकृतान् सदा ॥ १९४॥
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श्रद्धामेव तिरस्कृत्य ह्याध्यात्मिकेषु केवलम्।
पुरस्करोति यस्तर्कं तत्सङ्गमाचरेन्नहि॥ २२३॥
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नियममनुसृत्यैव सत्सङ्ग स्य तु मन ्दिरे।
वस्त्राणि परिधेयानि स्त्रीभिः पुम्भिश्च सर्वदा॥ २६२॥
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आदित्यचन्द्रयोर्ग्राह-काले सत्सङ्गिभिः समैः।
परित्यज्य क्रियाः सर्वाः कर्तव्यं भजनं हरेः॥ २६४॥
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निद्रां च भोजनं त्यक्त्वा तदैकत्रोपविश्य च।
कर्तव्यं ग्राहमुक्त्यन्तं भगवत्कीर्तनादिकम्॥ २६५॥
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जन्मनो मरणस्या ऽपि विधयः सूतकादयः।
सत्सङ्गरीतिमाश्रित्य पाल्याः श्राद्धादयस्तथा॥ २६७॥
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भूतप्रेतपिशाचादेर्भयं कदापि नाऽऽप्नुयात्।
ईदृक्शङ्काः परित्यज्य हरिभक्तः सुखं वसेत्॥ २७५॥
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सत्सङ्गरीतिमाश्रित्य गुर्वादेशाऽनुसारतः।
परिशुद्धेन भावेन सर्वैः सत्सङ्गिभिर्जनैः॥ २७२॥
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देशं कालमवस्थां च स्वशक्तिमनुसृत्य च।
आचारो व्यवहारश्च प्रायश्चित्तं विधीयताम्॥ २७३॥
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स्वाऽऽत्मब्रह्मैकतां प्राप्य स्वामिनारायणो हरिः।
सर्वदा भजनीयो हि त्यागिभिर्दिव्यभावतः॥ २८५॥
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हरेः प्रसन्नतां प्राप्य तत्कृपाभाजनो भवेत्।
जीवन्नेव स्थितिं ब्राह्मीं शास्त्रोक्तामाप्नुयात् स च॥ २८९॥
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अक्षरब्रह्मसाधर्म्यं संप्राप्य दासभावतः।
पुरुषोत्तमभक्तिर्हि मुक्तिरात्यन्तिकी मता॥ २९१॥
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संक्षिप्याऽत्र कृतं ह्येवम् आज्ञोपासनवर्णनम्।
तद्विस्तरं विजानीयात् सांप्रदायिकशास्त्रतः॥ २९२॥
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अक्षररूपतां सर्वे संप्राप्य स्वात्मनि जनाः।
प्राप्नुयुः सहजानन्दे भक्तिं हि पुरुषोत्तमे॥ ३०८॥
7. तुमुन् प्रत्यय
नाशाय सर्वदोषाणां ब्रह्मस्थितेरवाप्तये।
कर्तुं भगवतो भक्तिम् अस्य देहस्य लम्भनम्॥ ४॥
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शुद्धोपासनभक्तिं हि पोषयितुं च रक्षितुम्।
भक्तिं मन्दिरनिर्माणरूपां प्रावर्तयद्धरिः॥ ८७॥
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स्वदुर्गुणान् अपाकर्तुं संप्राप्तुं सद्गुणांस्तथा।
सत्सङ्गाऽऽश्रयणं कार्यं स्वस्य परममुक्तये॥ १२६॥
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प्रसन्नतां समावाप्तुं स्वामिनारायणप्रभोः।
गुणातीतगुरूणां च सत्सङ्गमाश्रयेत् सदा॥ १२७॥
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अन्तर्दृष्टिश्च कर्तव्या प्रत्यहं स्थिरचेतसा।
किं कर्तुमागतोऽस्मीह किं कुर्वेऽहमिहेति च॥ १४५॥
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प्रदातुं कर्मकारिभ्यः प्रतिज्ञातं धनादिकम्।
यथावाचं प्रदेयं तद् नोनं देयं कदाचन॥ १९९॥
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स्वामिनारायणे भक्तिं परां दृढयितुं हृदि।
गुरुहरेः समादेशाच्चातुर्मास्ये व्रतं चरेत्॥ २४०॥
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इत्येवमादि रूपेण श्रद्धया प्रीतिपूर्वकम्।
हरिप्रसन्नतां प्राप्तुं विशेषां भक्तिमाचरेत्॥ २४२॥
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सर्वैः सत्सङ्गिभिः कार्याः प्रीतिं वर्धयितुं हरौ।
उत्सवा भक्तिभावेन हर्षेणोल्लासतस्तथा॥ २४४॥
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तेषां स्थानविशेषाणां यात्रां कर्तुं य इच्छति।
तद्यात्रां स जनः कुर्याद् यथाशक्ति यथारुचि॥ २५९॥
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त्यागो न केवलं त्यागस्त्यागो भक्तिमयस्त्वयम्।
परित्यागो ह्ययं प्राप्तुम् अक्षरपुरुषोत्तमम्॥ २८६॥
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पठने चाऽसमर्थैस्तु श्रव्यं तत् प्रीतिपूर्वकम्।
आचरितुं च कर्तव्यः प्रयत्नः श्रद्धया तथा॥ २९४॥